जब से रियल एस्टेट रेगुलेशन अथॉरिटी यानी रेरा का गठन हुआ है, मकान खरीदारों की सुनवाई आसान हो गई है. यह बात तो आप कई बार सुन चुके हैं, लेकिन एक हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रेरा आने के बावजूद तमाम मकान खरीदारों को पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती है और आज भी देश में 27 लाख से ज्यादा मकान खरीदार परियोजनाओं की देरी के कारण फंसे हुए हैं. उन्हें न तो उनका पैसा वापस मिल रहा है और न ही प्रॉपर्टी का पजेशन.
मकान खरीदारों के संगठन ‘फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स’ (एफपीसीई) ने रियल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले रेरा कानून को राज्यों में ठीक से लागू नहीं किए जाने का आरोप लगाया है. संगठन का कहना है कि रेरा आने के 10 साल हो गए लेकिन आज भी देशभर में करीब 27.6 लाख घर खरीदार आवासीय परियोजनाओं में देरी के कारण फंसे हुए हैं. उनका पैसा भी वापस नहीं मिल रहा और न ही प्रॉपर्टी हाथ आ रही.
ठीक से लागू नहीं हो पा रहा कानून
एफपीसीई ने रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम (रेरा), 2016 के लागू होने के 10 साल पूरे होने पर जारी एक रिपोर्ट में कहा कि रेगुलेशन की नाकामी का खामियाजा मकान खरीदारों को भुगतना पड़ रहा. एफपीसीई के अध्यक्ष अभय उपाध्याय ने कहा कि रेरा एक कानून के रूप में विफल नहीं हुआ है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कमी रही है. जब क्रियान्वयन कमजोर पड़ता है, तो मजबूत से मजबूत कानून भी व्यवहार में विफल हो जाता है. यही रेरा के साथ भी हो रहा है.
आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के ‘रेरा ट्रैकर’ के दो मार्च, 2026 के आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि करीब 27.6 लाख मकान खरीदार परिवारों की रकम बिल्डरों के पास फंसी हुई है. प्रति परिवार औसतन 45 लाख रुपये की राशि मानने पर अधूरी परियोजनाओं में फंसी कुल रकम करीब 12.44 लाख करोड़ रुपये बैठती है. इसका मतलब है कि आम आदमी के 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बिल्डरों के पास फंसे हुए हैं.
डूब रही मकान खरीदारों की गाढ़ी कमाई
संगठन का कहना है कि मकान खरीदारों के लिए यह नियामकीय व्यवस्था का विषय न होकर उनकी जीवनभर की बचत, आवास और सुरक्षा से जुड़ा मामला है. संगठन ने रेरा के क्रियान्वयन में कई खामियों का जिक्र करते हुए कहा कि परियोजनाओं की समयसीमा बढ़ाने की अनुमति देते समय कानून में निर्धारित शर्तों की समुचित जांच नहीं की जा रही है. परियोजनाओं में देरी को दूर करने के बजाय उसे नियमित किया जा रहा है और प्रवर्तन की जगह प्रशासनिक रियायत ने ले ली है. रेरा के जरिये अब ऐसी व्यवस्था बन गई है, जिसमें देरी को संस्थागत रूप दिया जा रहा है.
क्या कहता है रेरा कानून
एफपीसीई रेरा कानून की धारा 41 के तहत गठित केंद्रीय सलाहकार परिषद (सीएसी) का सदस्य है. लिहाजा उसके सुझाव और शिकायत पर गौर करना भी रेरा का काम है. रेरा कानून के तहत बिल्डर को परियोजना से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां और मंजूरियां सार्वजनिक करनी होती हैं. उन्हें घर खरीदारों से प्राप्त राशि का 70 फीसदी अलग बैंक खाते में जमा करना भी आवश्यक है, जिसका इस्तेमाल केवल जमीन की लागत और परियोजना के निर्माण के लिए किया जा सकता है. इससे प्रोजेक्ट में देरी की संभावना कम हो जाती है.






