तकनीक के मामले में चीन हर दिन कुछ न कुछ नया करने में लगा हुआ है. चीन ने अपनी अपग्रेड की गई पनडुब्बी ‘जियाओलोंग’ के समुद्र में 7,000 मीटर की गहराई तक जाने का परीक्षण किया. इसके साथ ही इसने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का भी प्रदर्शन किया है. चीन का दावा है कि भविष्य में इसी तरह की तकनीक परमाणु ऊर्जा से चलने वाली सबमरीन में भी इस्तेमाल की जा सकती है. यह तकनीक पनडुब्बी के अंदर मौजूद क्रू को मुश्किल हालात में फैसले लेने और इमरजेंसी के हालातों से निपटने में मदद कर सकती है. ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की इस मानवयुक्त पनडुब्बी ने पश्चिमी प्रशांत महासागर के फिलीपीन बेसिन में तीन बार गोता लगाया. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, 27 अक्टूबर को हुए इन परीक्षणों के दौरान पनडुब्बी अधिकतम 7,056.9 मीटर की गहराई तक पहुंची.
समुद्र की गहराई में पनडुब्बी का मददगार बना AI
पनडुब्बी के इन परीक्षणों से पहले उसे बड़े स्तर पर अपग्रेड किया गया था. साथ ही इसमें AI से चलने वाला समुद्र तल का विश्लेषण करने वाला सिस्टम और एक अलग फॉल्ट-डायग्नोसिस सिस्टम लगाया गया. ये सिस्टम पानी के अंदर ऑपरेशन के दौरान पनडुब्बी के पायलट को जरूरी जानकारी और मदद देते हैं. यानी अभी तक जो AI दुनिया में इस्तेमाल हो रहा है, वहीं अब चीन अपनी पंडुब्बियों में इस तकनीक का इस्तेमाल कर अमेरिका से आगे निकलने की तैयारी कर रहा है. चीन और अमेरिका दोनों ही AI के सैन्य इस्तेमाल की संभावनाएं तलाशने में लगे हुए हैं. हालांकि, परमाणु हथियारों और उनसे जुड़े फैसले लेने की प्रक्रिया में AI की भूमिका को लेकर अभी काफी विवाद है.
शोधकर्ताओं ने इस सिस्टम को समुद्र की गहराई में रहने वाले जीवों और समुद्र तल पर मौजूद चीजों की 8 लाख से ज्यादा तस्वीरों की मदद से ट्रेन किया है.
पनडुब्बियों के सामने एक बड़ी चुनौती यह होती है कि पानी के अंदर डूबे रहने के दौरान वे लगातार सैटेलाइट से संपर्क नहीं कर सकतीं. ऐसे में पनडुब्बी के अंदर मौजूद क्रू को बाहरी मदद के बिना ही जटिल जानकारियों को समझना और अहम फैसले लेने पड़ते हैं. AI इस काम में मददगार साबित हो सकता है. यह सोनार से मिलने वाले सिग्नल को जांच सकता है, संभावित खतरों की पहचान कर सकता है, उपकरणों में खराबी का पता लगा सकता है और इंसानों के मुकाबले इमरजेंसी की कंडीशन में तेजी से तरीके सुझा सकता है. पानी के अंदर चलने वाले लंबे मिशन में ये तकनीक काफी मदद कर सकती है. लंबे मिशन के दौरान अगर कोई मशीन या पार्ट खराब हो जाए तो बाहरी तकनीकी मदद के बिना तुरंत कार्रवाई करनी पड़ती है.






