छत्तीसगढ़

 विस्थापन के बाद 85 परिवारों का आशियाना छूटा :  छोटे से फ्लैट में रहने की मजबूरी

रायपुर । नकटी में  बरसों पुराना आशियाना एक झटके  उजड़ जाए और उसके बदले जिंदगी महक 350 स्क्वायर फीट के एक छोटे से डिब्बेनुमा फ्लैट में सिमट जाए, तो कैसा लगता है ? यह दर्द उन 85 परिवारों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता, जिनके घर हाल ही में तोड़ दिए गए। लेकिन कहानी सिर्फ एक छोटे कमरे में सिमटने की नहीं है; असली संघर्ष तो उन बुजुर्गों और दिव्यांगों का है जिन्हें इस नई व्यवस्था ने तीसरी मंजिल पर धकेल दिया है।

 350 स्क्वायर फीट का कमरा और अंतहीन सीढ़ियां

विस्थापन के बाद मिले इन सरकारी फ्लैटों की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि यहाँ लिफ्ट  की कोई सुविधा नहीं है। प्रशासन ने बिना मानवीय दृष्टिकोण अपनाए, कई ऐसे बुजुर्गों और दिव्यांगों को तीसरी मंजिल पर फ्लैट अलॉट कर दिए हैं, जो बिना सहारे के दो कदम भी नहीं चल सकते।

अब रोज़मर्रा की ज़रूरतों, राशन या डॉक्टर के पास जाने के लिए इन्हें खतरनाक और ऊंची सीढ़ियां चढ़ने-उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

घुटने जवाब दे चुके हैं, नीचे उतरूं तो कैसे?

नाम न छापने की शर्त पर एक 72 वर्षीय बुजुर्ग ने रुंधे गले से बताया, *”साहब, हमारा घर तो टूट गया। यहाँ तीसरी मंजिल दे दी। घुटनों के दर्द के मारे दो सीढ़ी नहीं चढ़ा जाता, अब रोज़ तीन मंजिल चढ़ना-उतरना हमारे लिए मौत की सजा जैसा है। ऐसा लगता है जैसे अपने ही घर में नजरबंद हो गए हैं।

 संवेदनहीनता की हद: नीति में सहानुभूति गायब

नियमों के मुताबिक, जब भी किसी झुग्गी या बस्ती का विस्थापन किया जाता है, तो दिव्यांगों और वृद्धों को प्राथमिकता के आधार पर ग्राउंड फ्लोर या निचली मंजिलें दी जानी चाहिए। लेकिन इस मामले में साफ तौर पर प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता दिखाई दे रही है, जहां बिना किसी सर्वे या जांच के सीधे पर्ची सिस्टम से फ्लैट बांट दिए गए।

 मुख्य सवाल

  1. जब बहुमंजिला इमारत में लिफ्ट नहीं थी, तो बुजुर्गों और दिव्यांगों को ग्राउंड फ्लोर क्यों नहीं अलॉट किया गया?
  2. 350 स्क्वायर फीट के इस छोटे से दायरे में बड़े परिवार अपनी जिंदगी सम्मान से कैसे बसर करेंगे?
  3. क्या प्रशासन इस गलती को सुधारते हुए इन परिवारों के फ्लैट्स को नीचे की मंजिलों पर री-अलॉट करेगा?

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