बिलासपुर| छत्तीसगढ़, बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में खुद को नामी कार्डियोलॉजिस्ट (दिल का डॉक्टर) बताकर मरीजों की जिंदगी से खेलने वाले फर्जी डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव के खिलाफ पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी है।
डॉक्टर पर आरोप है कि उसने फर्जी डिग्री और नाम बदलकर सालों तक लोगों की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की, जिसके दौरान करीब 27 मरीजों की जान चली गई। इस हाई-प्रोफाइल मामले में प्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की भी जान गई थी। अब पुलिस द्वारा अपोलो अस्पताल प्रबंधन को क्लीन चिट दिए जाने के बाद शुक्ल के परिजनों ने जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए CBI जांच की मांग की है।
19 साल बाद खुला राज, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष की मौत का कनेक्शन
यह पूरा मामला तब खुला जब मध्य प्रदेश के दमोह से इस फर्जी डॉक्टर की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद अप्रैल 2025 में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दिवंगत राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के परिजनों को अहसास हुआ कि उनके पिता की मौत का जिम्मेदार यही जालसाज था।
अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, 2002 से 2006 के बीच राजेंद्र प्रसाद शुक्ल का 13 बार इलाज हुआ था। 1 जून 2006 को इस फर्जी डॉक्टर की नियुक्ति हुई और 2 अगस्त 2006 को इसने शुक्ल की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की। ऑपरेशन के कुछ ही घंटों बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और 18 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद 20 अगस्त 2006 को उनका निधन हो गया था।
फर्जी नाम से बनवाए आधार और पैन कार्ड
पुलिस जांच में पता चला है कि आरोपी ने न केवल मेडिकल काउंसिल बल्कि देश के नागरिक दस्तावेजों में भी सेंध लगाई थी। उसने नरेन्द्र जॉन कैम के नाम से फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य पहचान पत्र तैयार करवाए थे। छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल और उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थानों से जब पुलिस ने दस्तावेज जुटाए, तो आरोपी की कोई भी डिग्री वैध नहीं पाई गई।
27 मौतों का जिम्मेदार, पर शिकायत सिर्फ दो
पुलिस रिमांड में आरोपी ने कबूला कि उसने कई गंभीर ऑपरेशन किए, लेकिन वह अपनी विशेषज्ञता का एक भी कानूनी दस्तावेज पेश नहीं कर सका। उसके कार्यकाल में 27 मरीजों की मौत हुई, लेकिन केवल दो ही औपचारिक शिकायतें दर्ज होने और पुराने मेडिकल रिकॉर्ड्स के अभाव के कारण पुलिस इन मौतों को कानूनी रूप से सीधे आरोपी की फर्जी डिग्री से लिंक नहीं कर पाई।
अपोलो को क्लीन चिट मिलने पर उठे सवाल
27 जून 2025 को पुलिस ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने (कूटरचना) और अवैध तरीके से इलाज करने की धाराओं में चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति को पूरी तरह बरी कर दिया। पुलिस का कहना है कि अस्पताल द्वारा जानबूझकर फर्जी डॉक्टर रखने या किसी आपराधिक षड्यंत्र के सबूत नहीं मिले हैं।
इसी बात को लेकर अब पीड़ित परिवारों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि इतने बड़े नामी अस्पताल ने बिना दस्तावेजों की जांच किए एक फर्जी डॉक्टर को इतने संवेदनशील विभाग का जिम्मा कैसे सौंप दिया? परिजनों का मानना है कि सच सिर्फ सीबीआई की उच्च स्तरीय जांच से ही बाहर आ सकता है।






